Arthroscopy (ऑर्थोस्कोपी)

ऑर्थोस्कोपी क्या है
हड्डी रोग के क्षेत्र में दूरबीन द्वारा जोड़ो की शल्य क्रिया को ऑर्थोस्कोपी कहा जाता है जोड़ो की जटिल संरचना व अत्याधुनिक विकसित उपकरणों की आवश्यकता के कारण इस पद्वति की आवश्यकता के कारण इस पद्वति का प्रारम्भ अन्य दूरबीन पद्वतियों से बाद में शुरू हुआ। ऑर्थोस्कोपिक सर्जरी का प्रारम्भ जापान में 1881 में हुआ जहां पहली बार प्रोफेसर टकागी ने घुटने के जोड़ का सफलतापूर्वक परीक्षण किया, इसके बाद लगातार उपकरणों व तकनीक में सुधार हुआ और अन्य जोडो की दूरबीन शल्य प्रक्रिया भी सफलतापूर्वक प्रारम्भ हुई। भारतीय खिलाडियों में सचिन तेंदुलकर, श्रीनाथ, भारोतोलक मल्लेश्वरी आदि इस सर्जरी को करवा कर लाभावान्ति हो चुके है।ओपन सर्जरी में जोर्ड के मार्ग में आने वाली मांस पेशियो व जोड के बाहरी आवरण को काटना पड़ता है। साथ ही जोड़ के कुछ हिस्से ऐसे भी होते है जिन तक पहुँचने के लिये जोड़ को पूरा खोलना पड़ता है। जिससे जोड़ में लम्बे समय तक तकलीफ रहती है। इन सभी परेशानियों को देखते हुए विदेशो में लम्बे समय से दूरबीन द्वारा जोडों की शल्य क्रिया ऑर्थोस्कोपी की जा रही है और अब भारत में भी यह पद्वति बडी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।

-: दूरबीन द्वारा की जाने वाली सर्जरी :-

घुटने की शल्यक्रिया -









घुटने के जोड़ सम्बन्धित रोगो के निदान में ऑर्थोस्कोपी का विशिष्ट स्थान है। हमारें जोड़ में बारीक स्प्रिंग जैसी नसे (LIGAMENTS) व दो गदिया (MENISCUS) होती है, गदियों के जोड़ को घिसने से रोकने का होता है इसी तरह स्प्रिंग जैसी नसे (LIGAMENTS) घुटने की स्थिरिता के लिये आवश्यक है। आपाधापी वाले हमारे जीवन चर्या में घुटने में लचक आना, घुटने का तेजी से घूम जाना या फिसलकर गिरने से घुटने, में स्थित गदियों (MENISCUS) व घुटने की नसों (LIGAMENTS) में चोट की संभावना रहती है। मामूली चोट आराम से ठीक हो सकती है। परन्तु गदिया या लिगामेन्ट के टूटने पर ऑर्थोस्कोपी द्वारा इलाज ही एक मात्र विकल्प बचता है। गद्दी (MENISCUS) के टूटने पर घुटने में लगातार दर्द रहता है विशेष कर उकडू बैठने पर, सीढियां चढने व उतरने में व घुटने पर वजन डालने में परेशानी आती है। टूटी गद्दी के टुकडे के जोड में फसने पर जोड के अटकने की तकलीफ भी हो सकती है। ऑर्थोस्कोपी द्वारा मेनिस्कस के फटे हिस्से को निकालकर या उसे मुख्य मेनिस्कस के फटे हिस्से के साथ टांके लगाकर (MENISCUS REPAIR) इस तकलीफ का इलाज किया जाता है। घुटने के लिगामेन्ट, (ANTERIOR & POSTERIOR CRUCIATE, LIGAMENTS) टूटने की अवस्था में हमारे शरीर से ही दूसरी नस लेकर जोड़ में दूरबीन की मदद से डाल दी जाती है। ये नया लिगामेन्ट पूर्व के लिगामेन्ट से भी अधिक ताकतवर होता है।

घुटने संबंधित अन्य रोग जैसे घुटनें की झिल्ली की सूजन (SYNOVITIS) के रोगी बहुतायत से पाये जाते है, इस सूजन का मुख्य कारण जोड की टीबी, गठिया बाय, जोड की पुरानी चोट आदि होते है। इस सूजन से जोड को मोड़ने में परेशानी आती है व लगातार दर्द बना रहता है, बीमारी से जोड की गद्दी व कार्टिलेज को भी नुकसान होता है, दूरबीन द्वारा इस झिल्ली को हटाकर जोड़ को नुकसान से रोका जा सकता है व जोड के मुडने में भी आसानी होती है। जोड़ के घिसने की अवस्था (OSTEO ARTHRITIS) में भी आर्थोस्कोपिक सर्जरी का महत्वपूर्ण योगदान है प्रथमतः जोड की गद्दी या लिगामेन्ट की बीमारी से जोड़ जल्दी घिसने लगता है इन बीमारियों को ठीक करने से इस घिसाव को रोका जा सकता है। OSTEO ARTHRITIS में जोड़ लगातार घिसने से हड्डी के महीन टुकडे जोड़ में फसने लगते है साथ ही गद्दी व कार्टिलेज के धिसने से जोड़ में लगातार दर्द बना रहता है ऑर्थोस्कोपी द्वारा इस गद्दी व कार्टिलेज का प्रभावी इजाल संभव है। इस बीमारी में हड्डी के बढे हुये किनारे (OSTEOPHYTES) तकलीफ का मुख्य कारण होते है इन बढी हुई हड्डी के उभारो को भी दूरबीन द्वारा आसानी से हटाया जा सकता है। इसके अलावा कई बार घुटने में चोट लगने या घुटने की हड्डी के आॅपरेशन के बाद घुटने में रेशे (FIBROUS ADHESION) बन जातें है जिससे जोड के मोडने में परेशानी होती है। ऑर्थोस्कोपी द्वारा इन रेशों को हटाकर जोड़ को पूरा मुडने लायक बनाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त जोड़ की बीमारी का पता डाइग्नोस्टिक ऑर्थोस्कोपी के द्वारा भी लगाया जा सकता है।

कन्धे संबंधित रोग :-

कन्धे का जोड़ हाथ के हर कार्य में उपयोगी है। यह जोड एक कमजोर प्रकृति का जोड माना जाता है कई बार चोट लगने से कन्धा उतर जाता है जिससे जोड की भीतरी झिल्ली (LABRUM) फट जाती है, इस बीमारी से कन्धा आवश्यकता नहीं होती। झिल्ली (LABRUM) फट जाती है, इस बीमारी से कन्धा बार-बार उतरने लगता है, दूरबीन द्वारा इस फटी झिल्ली को ठीक किया जा सकता है एवं इसी विधि द्वारा जोड़ को खोलने की जरूरत नहीं होती है, जोड़ के बाहरी आवरण (CAPSULE) का सिकुडना कन्धे (FROZEN SHOULDER) की आम बीमारी है, इस बीमारी के रोगी के कन्धे में लगातार दर्द बना रहता है, यह दर्द जब कसरत व दवाईयों से नहीं मिटता तब दूरबीन द्वारा शल्यक्रिया (ARTHROSCOPIC CAPSULAR RELEASE) इसके अतिरिक्त कन्धे के बाहरी परत का फटना (ROTATOR CUFF TEAR) कन्धे की हड्डी का घिसना (OSTEO ARTHRITIS) व अन्य कन्धे के दर्द संबंधित बीमारियों का इलाज भी दुरबीन द्वारा सफलतापूर्वक किया जा सकता है एवं इस पूरे इलाज के लिये जोड़ को खोलने की आवश्यकता नहीं होती।

टखने संबंधित रोग :-

टखने के जोड़ की पुरानी मोच से कुछ मरीजो के जोड़ के भीतरी हिस्से में सूजन आ जाती है। इस कारण से इनके टखने में लम्बे समय तक दर्द बना रहता है इस तरह के रोगियो के जोड़ के भीतरी झिल्ली को दूरबीन पद्वति द्वारा हटाकर रोगियो को लाभ पहुँचाया जा सकता है। टखने के जोड़ के घिसने, जोड़ में हड्डी के टुकडे (LOOSE BODY) के फसने आदि का इलाज भी ऑर्थोस्कोपी द्वारा संभव है।

कोहनी व कलाई के जोड़ :-

कोहनी व कलाई के जोड़ की कुछ दर्द संबंधित समस्याओं व कोहनी में आने वाली सूजन का इस विधि द्वारा सफलतम उपचार किया जा सकता है।

-: ध्यान देने योग्य बाते :-

  • ऑर्थोस्कोपी द्वारा जांच के बाद रोगी अगले दिन से ही चल सकता है। पर शल्य क्रिया के बाद खडे होने से पहले अपने चिकित्सक की पूर्ण सलाह ले।

  • ऑर्थोस्कोपी एक विशिष्ट सर्जरी है अतः इस शल्य क्रिया के विशेषज्ञ चिकित्सक द्वारा ही करवाये ऑपरेशन से पूर्व उसके विषय में पूर्ण जानकारी व नुकसान के बारे में पता लगाये ।

  • इस सर्जरी के बाद-कसरत का भी अति विशेष स्थान है अतः अपने चिकित्सक द्वारा बताये गये निर्देशो का पालन करें

  • इस शल्य क्रिया को टीवी मॉनिटर पर देख कर किया जाता है और सर्जरी के मुख्य चरण आप स्वयं भी देख सकते है आप अपने चिकित्सक से इसकी रिकोर्डिंग के लिये भी निवेदन कर सकते है।

  • कुछ केन्द्रो पर ऑस्टियो आर्थराइटिस के इलाज के लिये ऑर्थोस्कोपी के नाम पर सिर्फ जोड़ की SALINE से धुलाई कर उसे बन्द कर दिया जाता है। जो कि किसी भी रूप मे ऑर्थोस्कोपी सर्जरी नहीं है। इस बीमारी में जब तक बढी हुई हड्डी व गद्दी का इलाज दुरबीन द्वारा न हो तो मरीज को फायदा नहीं पहुँचता है। अतः यह शल्य क्रिया विशेषज्ञ चिकित्सक द्वारा ही कराये।

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